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Saturday, November 13, 2010

उम्मीद

सूरज कि पहली किरने, गीत सुनाती है तेरे !
पूरब से बहती लाली,बस रंग दिखाती है तेरे !
वायु की पहली सांसो में होती है तेरी छुअन !
पंछी तक पहले कलरव में नगमे गाते हें तेरे !

( Lake side IITb)

फूलों की पहली धडकन में, खुशबू बहती हें तेरी !
शबनम की ढलती बूंदों में, कुछ बातें रहती है तेरी !
नीले रंग पटल पर कोई, रंगता हें तेरे चेहरे !   
ईश्वर की हर इक रचना में, सूरत होती हें तेरी !!
 
( Lake side IITb)
 
पर ख्वाब बिखरते भोर सुबह, जब दुनिया होती अँधेरी !
लम्हों की हर टिक-टिक में, टिक-टिक करती यादें तेरी !
खोलूं नयन या बंद रखूं, कुछ फर्क नहीं लगता मुझको,
ऐसे भी तू ही दिखती हें, वैसे भी तस्वीरें तेरी  !!

ये दुनिया तुम्हें सुनाती है, ये दुनिया तुम्हें दिखाती है !   
क्या ये तेरी एक बेशर्मी है, या मेरी ही नादानी है !

उम्मीद पिटारी में बैठी, फिर भी कुछ ख्वाब बनाती है !
आँखें में खोलूं एक दिन और सच में तुझको पा जाऊं !
या आंखे बंद करूँ इक दिन और ख़्वाबों में ही खो जाऊं !
या आंखे बंद करूँ इक दिन और ख़्वाबों में ही खो जाऊं !
उम्मीद पिटारी में बैठी, फिर भी कुछ ख्वाब बनाती है !
उम्मीद पिटारी में बैठी, फिर भी कुछ ख्वाब बनाती है !


(Kailana, jodhpur )
ऋषभ जैन

Sunday, October 24, 2010

दिल

जब से तुम गए,
दिल बेजान सा पड़ा था !
ना कोई धड़कन ,
ना जज़्बात ,
ना ही कोई चाहने वाल !
सोचा बेच आऊ हाट पर
कुछ गुज़ारा चले !!
लोग आते,
दिल की नुमाइश होती,
उठा पटक कर
जांचा जाता,
घूरा जाता,
हाँ का स्वर उभरता चेहरे पर

लगता
ये ले जाएगा दिल को
उसे आसरा देगा
पर अचानक
ना जाने क्यों?
वे एक आह के साथ
रख जाते दिल को
बेबस सा बेघर !!


आखिर मैंने उठाया
पहली बार देखा ध्यान से
तब जाना सच,
मैं जानता नहीं कौन
पर कोई बेहया सा
दिल में
दरार कर गया था !!

Tuesday, September 21, 2010

खुदा!! (उर्दू में पहली कोशिश )

[इस रचना में मैंने खुदा और कौम शब्द किसी धर्म विशेष के लिए नहीं लिखा है ! साथ ही कुरआन को किसी धर्म से न जोड़कर सच्चधर्म के रूप में देखा जाये ! मुझे ख़ुशी होगी अगर आप अपनी सोच वृहत रख कर ये पढेंगे ! मेरा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओ को आहात करना नहीं है !! ]

सियासत की सियाही में जो डूबकर लिक्खा !
लिक्खा नहीं था वो मैंने गद्दार ने लिक्खा !!
पर ईमान की इबारत से मैंने शब्द जो उकेरे !
तारीफे ना मिली, लेकिन इंसान ने लिक्खा !!

जिस ज़मीं को कई पीर पैगम्बरों ने सीचा !
रोशन था जहाँ चैन और अमन का बागीचा !
उस राम, बुद्ध महावीर  की पाक ज़मी पे अब !
चलता नहीं है क्यों  इमान का सिक्का !!

ऐ मददगार ! तुने इतने ज़ुल्म ज़ख्म जो किये !
छीने है कई अश्क! सितम, दर्द जो दिए !
क्यों बेशर्म सा तभी भी तू छुपकर है  यूँ बैठा !
ऐ खुदा, ऐ सितमगार अपना नूर (चेहरा) तो दिक्खा !!

जिन्होंने मासूम जिंदगियों के बुझाए कई दिये !
कौम के नाम पर कलम काफिरों के सर कई किये !
वे गुनेहगार इंसानियत के, इबादत को जो आये !
ऐ खुदा ! ज़रा गौर से उन्हें कुरान तो सिक्खा !!

ऋषभ jain
   









Saturday, September 11, 2010

एक छुपी कहानी


हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !
सिमटी हुई सी,
कभी आस्तीन कभी जेब कभी महक में छुपी !
झांकते है कुछ लम्हे कुछ यादे,
उन सिलवटो और निशानों से !
और सुनाते हें एक कहानी उस सफर की,
जो उसके धुलने के साथ ही  भुला दिया जाएगा !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !!
.
.
राजू का मिटटी से सना स्कूल का नीला शर्ट
बता रहा हें कि आज उसने खेला है फुटबाल
क्लास छोड़ कर !
कुछ भीगी सी आस्तीने गवाह हें
कि पसीना फिर उसने बाज़ुओ से ही पौछा है !
.
पड़ोस कि आंटी की
लखनवी डिजाईनर साड़ी पर लगे सब्जी के निशान
बता रहे है भोज में आये मेहमानों कि भूख को !
रोज़ मोहल्ले का डान बनकर घूमने वाले
महेश कि शर्त फटी हुई हें आज,
वो पिट कर लौट रहा है या हवालात से !
.
बड़े भैया के एक बाजू से
महक रहा है जनाना इत्र,
उस लड़की का
जिसके हाथ थाम जनाब सिनेमा देख आये हें !
पिताजी का सिलवटो और पसीने से भरा शर्ट
हिसाब देता हें उन पैसो का,
जो हम बेफ़िक्री से उड़ाते हें !
माँ की साड़ी में गंध और कालिख हें कोयले की,
लगता हें गैस फिर खत्म हो गई है !
आज फिर रोटी खानी होगी चूल्हे की !
.
मेरे दोस्त के टी शर्ट में बू हें धुए की सी,
शायद कही गली में छुप कर वो सिगेरेट सुलगाता होगा !
दादाजी कि उस पुरानी धोती से एक अजीब गंध आती हें
शायद तजुर्बे कि महक होगी !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें!!
.
.
चौराहे पर बैठे उस बूढ़े भिखारी का फटा कुर्ता
दशको से नहीं धुला,
उसमे छुपी हें अनगिनत सच्चाइयाँ
और लाचारी भरे लम्हे कई,
पर मोटे उपन्यासों को पढ़ने का वक्त किसी के पास नहीं !
पहाड़ के उस पुराने मंदिर में
जहा अब कोई नहीं जाता
एक ध्वजा लहराती हें,
कहती हें कहानी उन दिनों कि
जब इंसा इतना नास्तिक न था !
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें!!
.
.
अक्सर ये कहानिया वक्त बा वक्त धो दी जाती हें
एक नई इबारत लिखने को,
पर कुछ कहानियों को संजोया जाता हें सुनाने को !
जैसे कि मेरी अलमारी बड़े जतन से रखा वो रुमाल
जो फिरंगी मेम का चुराया था,
मानो महक आती हें उसमे परदेस की !
हाँ! और जैसे वो ‘मफलर’
जो भैया को उनकी सहेली ने दिया था शायद,
छूने भी नहीं देता किसी को
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें
.
.
लेकिन अलमारी में बिलकुल पीछे,
एक फौजी वर्दी टंगी हें चचाजान की !
घर के बड़े कभी कभी अकेले में
उसे देख कर रो लिया करते हें !
उस वर्दी पर आखिरी कहानी के शायद कुछ ज़ख्म बचे है
अब उसकी सिलवटो में कोई नई कहानी नहीं भरता
क्योंकि उन हरी स्लेटी सतहो लिखने वाला
लंबी छुट्टियों पर गया हें !!
हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें

ऋषभ जैन 

Thursday, September 9, 2010

Commentary

जिंदगी की पारी में वक्त है बल्ला टांगने का !
लोग कहते है कि में भूल जाऊं,
वो तेज तर्रार शाट लगाना !
वो नाचती सी फिरकी गेंदे फेकना !
मुश्किल गेंदों को गिरते फिसलते हुए से पकड़ना !
भूल जाऊ वो,
अच्छी पारी के बाद बल्ला हवा में घुमाना
और मैच हारने के बाद सर झुका मायूसी से लौटना !
भूल जाऊ उन दर्शकों को,
जो एक शाट पर तालियाँ
और एक गलती पर गालियां देते है !
साथ ही भूल जाऊं उन बूढ़े commentators को,
जो खुद भी कभी खिलाडी हुआ करते थे !
जिनकी सीखें और सबब आज कोई नहीं सुनता !
जो कांच के बक्सों में बैठे,
अनमने से कुछ उबाऊ सा बतियाते रहते है !!
.
.
.
.
आज कुछ साल बीत गए हें बल्ला टाँगे हुए !
अब कोई सुनता नहीं हें मेरी भी !
तजुर्बा अलमारी कि ऊपरी सतह पर रखा सड़ रहा हें !
कही अब वो पुराने दोस्त मिलते हें तो,
जिंदगी के मैच कि ज़रा commentary कर लिया करते हें !!
Rishabh Jain

Thursday, April 15, 2010

कौन समझाए (चलचित्र )

एक फ़रिश्ता

इस अनजान भीड़ में मैने खुद को खोया है,
पत्थर के खेतों में बीजों को बोया है,
इस दुनिया में लोगों के पास ज़ुबां तो है,
लेकिन कान नहीं ,
वहा गीत गाने का ख्वाब संजोया हें!!

तालियाँ सब बजाते है पर वो नाटक का एक हिस्सा है.
प्यार कर बैठते हें लोग पर वो ज़माने का एक किस्सा हें!
ढूंढते रह जाते हें जिंदगी भर एक हाथ थामने को,
क्योंकि विश्वास हें दिल में
खुदा ने छुपाया हमरे लिए भी एक फ़रिश्ता हें!!

Monday, April 12, 2010

कौन समझाए उन बातो को!!

कौन समझाए उन बातो को.
अनसुलझे से जज्बातों को!!

चाँद चमकता नील गगन में,
चांदनी चमके सूने चमन में!
कालिया सोई हे सारी सपन में,
अल्हड़पन है बहती पवन में!
सब होता हे क्यों इतना सुन्दर...
होता हु तन्हा मै जिन रातो को!!
कौन समझाए उन बातो को.
अनसुलझे से जज्बातों को!!

सावन की वो पहली बूंदे,
छूते थे जिन्हें हम आंखे मूंदे!
वो एकही छाते में छुप जाना,
फिर उसे छोड़ के खुद को भिगाना!
मौसम बदले हे तब से अनेकों...
पर भुला नही उन बरसातों को!!
कौन समझाए उन बातो को.
अनसुलझे से जज्बातों को!!
ढलती वे शामे साथ बिताना,
वक़्त को जैसे पर लग जाना!
हौले हौले नज़रे मिलाना,
नयन सिन्धु में फिर खो जाना!
साथ सफ़र पर सब कुछ ले गई.
छोड़ा है पीछे बस यादो को!!
कौन समझाए उन बातो को.
अनसुलझे से जज्बातों को!!
ऋषभ जैन
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