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फिर से चुनाव ...

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(चुनाव / election चाहे किसी भी स्तर के हो, देश, राज्य या विश्वविद्यालय किसी को भी परखना, किसी का साथ देना बेहद मुश्किल है। अक्सर सच-झूठ, दोस्ती-स्वार्थ, वादों-इरादों के बीच एक झीना सा पर्दा होता है।अपना कोना अधिक उजला।पुरानी दीवारों पर रंग पोते जाते है, वक़्त को कुरेद रिश्ते ढूंढे जाते है, बिसात बिछती है, मुहरों की खरीद फरोख्त, सच को छोड़ सबकुछ प्रदर्शित होता है। जीत चाहे किसी की भी हो, जनता अक्सर हांर जाती है।)
आज उजाले में कुछ साये, बेनकाब हो घूम रहे हैं ! चेहरे पर चेहरा पहने , अनजानो को चूम रहे हैं! आज उजाले में कुछ साये, बेनकाब हो घूम रहे हैं !!
कौन है अपना, कौन पराया ! किसी का सच , किसी ने चुराया ! जाम दोस्ती, वैर के पी, बेहया से झूम रहे है ! आज उजाले में कुछ साये, बेनकाब हो घूम रहे हैं !!
आँख, कान पर अब नहीं भरोसा ! दिल भी देने लगा है धोका ! शक उन पर भी है अब तो , जो रुई से मासूम रहे है ! आज उजाले में कुछ साये, बेनकाब हो घूम रहे हैं !!