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परछाई

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परछाई कहती नहीं मुश्किल है सफर, परछाई पूछती नहीं मजिल है कहाँ, परछाइ छोड़ती नहीं तुम्हें तेज़ धुप में, बस चुप-चाप साथ चलती है, नंगे कदमों को ज़मीं से छूने नहीं देती|
जब होती है नज़रें तुमपर, जब होता है रोशन जहाँ, जब जुबां चखती है शोहरत का स्वाद, छुप जाती है कहीं पीछे कोने में परछाइयाँ, लेकिन अँधेरे में हर ओर ढक लेती है मुलायम कम्बल सी|
बेसुरे गीत सुनती है तेरे, बाँटती है तन्हाइयाँ झील किनारे, सुनती है हर शिकायत ख़ामोशी से, वो थामे रखना चाहती है तुझे, चाहे ढलता सूरज जिंदगी खत्म कर रहा हो उसकी|
हर दुःख में सहलाती है वो, हर करवट वो तेरे साथ बदलती है,