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Thursday, March 1, 2012

एक चोमू था ...


[ये छोटी सी कहानी ठीक दो साल पहले मैंने होली पर लिखी थी, इस कहानी के पात्र प्रेरित है लेकिन घटनाएं काल्पनिक ... शायद]

एक चोमू है| अंडाकार मुँह, सामान्य कद-काठी, सर पर खिचड़ी से बाल, सुनहरे फ्रेम का चश्मा और चेहरे पर नेताओं वाली मुस्कान| मुझसे तीन कमरे छोड़ कर वो अकेला रहता है या यह कहना बेहतर होगा कि अकेला कर दिया गया है| जब रोज़ सुबह बरामदे के आखिर कमरे से में उनींदी ऑंखें लिए निकलता हूँ तो चोमू नहा कर लौट रहा होता है| एक हाथ में बाल्टी थामे, दूसरा हाथ उठा कर आते हुए लोगो को 'गुड मार्निंग' बोलता है| लेकिन आठ महीने बीते किसी ने शायद ही उसे पुनः अभिवादित किया हो| मेरे पास से गुजरते हुए आशाभरी नज़रों से वो मुझे भी देखता है और मैं नींद में होने का बहाना कर पैर घसीटता आगे बढ़ जाता हूँ|

होस्टल का हर दिन एक उत्सव है| हँसी- मजाक, गप्पे, क्रिकेट, ताश और वक्त मिला तो पढ़ भी लिए| लेकिन चोमू के लिए ये उत्सव मात्र देखने का तमाश है| गुजरते हुए चोमू को लोग कुछ इस तरह अनदेखा कर देते है जैसे खामोश हवा, जिसकी उपस्थिति को लोग महसूस तो करते है पर देख नहीं पाते| अगर कभी उसने हिस्सा लेना भी चाहा तो उसी वक्त सभी को कुछ आवश्यक काम याद आ जाता है और चोमू फिर अकेला रह जाता है| चेहरे कि हँसी गायब है, गुमसुम, उदास, अकेला | एक अकेला आँसू आँख का बांध तोड़कर उसके गालों से बह चला, मानो वो भी उसका साथ छोड़ चला हो|

स्थितियाँ हमेशा से ऐसी नहीं थी| उसका असली नाम आनंद है| आनंद यादव|
तब सभी नए थे, देश के हर कोने से, अलग – अलग आर्थिक, पारिवारिक स्थितियाँ| सभी ने ध्यान  एक दुसरे को परखने, जांचने और तालमेल बिठाने में लगा दिया और जल्द ही सभी के समूह और दोस्त बन गए| लेकिन आनंद किसी समूह में ना था| शायद वो खुद को खास समझता था, मिजाज़ में अकड़पन और घमंड| हमने बात करने कि कोशिश की, ज़रा समझाया भी पर कोई असर नहीं| इसी सिलसिले में बात ज़रा बढ़ गयी| आनंद के व्यवहार ने भी आग में घी का काम किया| जल्द ही सब आनंद से नफरत करने लगे| उसके कमरे के बाहर बड़े बड़े अक्षरों में चोमू लिख दिया गया और कमरों की लंबी कतार से एक कमरा उसमे रहने वाले के साथ काट दिया गया|

इस तरह आनंद चोमू बना और आज तक जो हो रहा है वो उसी का नतीजा है, शायद यही चोमू चाहता था |

आज होली है, वो दिन जब सारे गुनाह रंगीन पानी से धो दिए जाते है|

हम सभी चितकबरे रंगों में सजे एक दुसरे पर रंग-गुलाल उड़ा रहे थे| लेकिन चोमू के चेहरे पर रंग की एक रेखा भी नहीं| उसके सफ़ेद शर्ट पर कुछ रंग भरे हाथों के निशाँ ज़रूर थे, जो शायद जानबूझ कर लोगो के गले मिलने से बने थे| लोग मस्ती में इतने उन्मुक्त थे के शायद उससे दूर भागना भूल गए थे, पर फिर भी उन्हें इतना याद था कि चोमू को रंग न लगाया जाए| आखिर वो कितनी कोशिश करता| उसका घमंड तो बहुत पहले ही हार चुका था, आज चोमू खुद भी हार गया| किसी ने नहीं देखा पर वो आँसू पोंछता हुआ बरामदे से बाहर निकल गया| अनजाने में ही उसने हाथों में लगे रंगों से अपना चेहरा खुद ही रंग दिया था| बरामदे के आखिरी सिरे पर खड़ा मैं यह देखता रह गया| मुझे खुद पर शर्म आ रही थी| एक घुटन भी, मानो एक गहरे सच में अचानक डूबाया गया हो| 

ये हम क्या कर रहे है? अगर ये सब मेरे साथ हो रहा होता तो मैं शायद आंसुओं को छुपाने के काबिल भी ना रहता| घर से कई सौ मील दूर अगर आज भी कभी माँ की याद आती है तो दोस्त की गोदी में सर रख सो जाता हूँ| वहीँ शायद वो रात भर जागकर ठंडा तकिया और सीलन भरी दीवारें ताकता होगा| दोस्तों के बिना हर लम्हा एक सजा है फिर यहाँ तो आठ महीने बीत चुके है| वक्त के थपेड़े पहाड़ों को भी घिस देते है फिर चोमू तो इंसान है| वो शायद बदल गया है| हमने उसे एक बार चोमू तो बना दिया लेकिन फिर कभी आनद बनने का मौका ना दिया|

मैं कसम खाता हूँ कल सुबह उठकर खुद उसे 'गुड मार्निंग' बोलूँगा |

एक चोमू था ...


  
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