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Showing posts from April, 2012

तस्वीर

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पुराने बंगले में, पीछे, एक लंबा, खामोश गलियार है। ठंडा और सीलन भरा, हवा तक कतरा के जाती है। बेरंग दीवारों पर, रंगहीन तस्वीरों की कतार, जाने कब से टंगी है। सर्दी में, पीपल के पत्तों से बचकर, रोशनी, अधखुली खिड़की चढ़कर , अन्दर आ जाती है, कोशिश करती है, तस्वीरों को रंगने की। पुराने बंगले में, पीछे, एक लंबा, खामोश गलियार है। फुरसत में इक दिन, कदम गए उस ओर, देखा तस्वीरों को निहारता, वक़्त मायूस सा खड़ा है। वजह पूछी तो, जवाब मिला, "क्या बताऊँ दोस्त! ... ... आजकल वक़्त कुछ ठीक नहीं।"      

ये ज़िंदा लाशों का शहर है

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ये ज़िंदा लाशों का शहर है।  ठहरी हुई ज़िन्दगी थामकर  लोग रोज़ भागते है, किस और भागते है, क्या खबर ? मंजिल दूर ही रहती है ... खुद गुमशुदा रास्ता दिखाते है, अंतहीन इस भूल-भुलैया में रोशनी में रास्ता दिखता नहीं, अंधेरों में रोशनी तलाशते है ...   ये ज़िंदा लाशों का शहर है। घड़ियाँ यहाँ मनमौजी है, कभी दौडती बेसुध, कभी थम सी जाती है .. फुर्सत में आइना अजनबी लगता है, न जाने कौन ?  सफ़ेद बाल, झुरियां थकी सी, कल तो उसपार एक नौजवान रहता था। आग जलती रहे अगली सुबह भी  इस कोशिश में, रंगीन पानी में हर रात डुबाते है ..  ये ज़िंदा लाशों का शहर है। यहाँ शोर में खामोशी है, पर सनातों का शोर है ... आँख खोल कर सोते है, जागते बंद आँखों से ... हकीकत बेच कर यहाँ सपने खरीदते है लोग ... उगती शामों में परिंदे, घर नहीं लौटते, ना ही माँ इंतज़ार करती है .. चूल्हे की आग ठंडी सी है। ये ज़िंदा लाशों का शहर है। लो इस अजीब शहर में,  एक सुबह फिर 'डूब' गई ।

शोक-समाचार - 'संयुक्त प्रवेश परीक्षा ने ली अंतिम सांस'

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संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) (9 अप्रैल 1960 – 8 अप्रैल 2012) लंबे समय से कपिल चप्पल की मार झेल रही 'संयुक्त प्रवेश परीक्षा' ने अंततः 8 अप्रेल, सांयकाल 5 बजे दम तोड़ दिया| आप 52 वर्ष के थे| आप प्रारम्भ से ही बड़े सख्त मिजाज थे| बच्चों के देखकर ही आपका पारा चढ जाता और आप उन्हें डराने धमकाने लगते| फलस्वरूप छोटे बालकों में आपका आतंक व्याप्त हो गया| लेकिन बढ़ती उम्र के साथ आपके मिजाज़ में कुछ नरमी आई| 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' के साथ लगभग तीस वर्षों तक आपके मधुर वैवाहिक सम्बन्ध रहे| जिसके फलस्वरूप अपनी युवावस्था में आपके सात पुत्र हुए| सभी ने बड़े होकर अलग-अलग शहरों में अपने पिता का नाम रोशन किया| लेकिन इतने से उनकी सांसारिक इच्छाएँ खत्म नहीं हुई| अपनी ढलती उम्र में भी आपने 'फाईट मार कर' आठ कमजोर-कुपोषित बच्चों को जन्म दिया| ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे 'क्वालिटी' की बजाए 'क्वांटिटी' पर ज्यादा ध्यान दे रहें है| बाद में आपका रुझान कोटा नामक 'कोठे वाली' की तरफ बढ़ने लगा| उनकी पत्नी (मानव संसाधन विकास मंत्रालय) ने कोटा से उन