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Showing posts from August, 2012

एक कलाम, जगजीत के नाम

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ग़मों पर सरगम सजा,
वो धुन सुनाता रहा,
जुबां ने चुप्पी साध ली,
वो ग़ज़ल गुनगुनाता रहा।

वो इश्क भी एक झूठ था,
झूठे उम्र भर के वायदे,
जिनके शहर थे उजड़ गए,
उनके घर बनाता रहा।

तेरे हुस्न की बारीकियां
तेरे होंठों से नजदीकियां,
लगा सामने तू आ गया,
वो ग़ज़ल सुनाता रहा।

जब शोर में संगीत था,
और संगीत में शोर था,
तूफानी वो दौर था,
वो कश्ती कागज़ की चलाता रहा।



बापू! अब मत आना

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२१वी सड़ी ने धरती पर कदम रखा ही था| बदलाव की आंधी संस्कृति और संस्कारों को उड़ा रही थी |इस बदलाव से स्वर्ग भी अछूता ना रहा| वीणा के सुरों के स्थान पर अब इलेक्ट्रिक गिटार का 'बेकग्राउंड म्यूजिक' बजने लगा|मेनका की जगह 'ब्रिटनी' अप्सराओं की 'रोल मोडल' बन गयी और जो नेता यमराज को रिश्वत देकर वहां पहुंचे थे, वे अपनी अपनी पार्टी बना इंद्र की कुर्सी के लिए लड़ने लगे|
इन सब के बावजूद 'बापू' तटस्थ रहे| लेकिन एक दिन बापू का चरखा 'ओल्ड फैशंड' बता कर स्वर्ग से फेंक दिया गया| उनका मन उचाट गया| उन्होंने सत्याग्रही अनशन करने की कोशिश की तो अप्सराओं ने ज़बरदस्ती अंगूर खिला दिये| अंततः तंग आकर बापू स्वर्ग त्याग दिया | वे अपने प्यारे आज़ाद भारत को देखने पृथ्वीलोक आ गए और मुंबई घूमने लगे|
चारों ओर ऊँची इमारतें, तेज़ भागती गाड़ियां, माल सब उनकी कल्पना से परे था| उन्हें गर्व हुआ भारत की तरक्की पर| जगह जगह उनके स्मारक, मूर्तियाँ , रास्तों के नाम, नोट पर तस्वीर देख बापू का अचम्भा और बढ़ गया| सोचा चलो भारत सही रस्ते जा रहा है|
अचानक दो युवक उन्हें देख रुक गए, पहला  बोला…

ग़ज़ल

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जो बयान जुबां से हो जाए, वो आशिकी क्या है? जो होश में कट जाए, वो ज़िन्दगी क्या है?

देखा  है  नूर  तेरा, हर  ज़र्रे  में  कायम, जो नज़र मंदिर में ही आए, वो बंदगी क्या है?


कसम याद में मेरी, आँसू ना बहाना, जो अश्कों में बह जाए, वो बेबसी क्या है?

ना जुबां पर शिकायत, ना चेहरे पे शिकवा, जो पराये समझ जाए, वो बेरुखी क्या है?  

हर मोड़ पर, इस शहर में, आशिक बहुत तेरे, जिसे तारों ने ना घेरा, वो चांदनी क्या है?


अधूरी गज़ल

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रात आधी, बात आधी, एक जाम है आधा, मैं अधूरा, तुम अधूरी, शब् पर चाँद है आधा||
मुझसे मिलकर ही तो, हो पाएगा पूरा, है सुन्दर बहुत लेकिन, तेरा नाम है आधा |
पुरानी चोट है दिल में, दवा रोज़ पीता हूँ, आधी हुई है ख़त्म, बचा अब दर्द है आधा|
फिसल के हुस्न पर तेरे, सज़ा का हकदार मैं बना,  पर सज़ा की तू भी है हकदार ,तेरा गुनाह है आधा |