हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें ! सिमटी हुई सी, कभी आस्तीन कभी जेब कभी महक में छुपी ! झांकते है कुछ लम्हे कुछ यादे, उन सिलवटो और निशानों से ! और सुनाते हें एक कहानी उस सफर की, जो उसके धुलने के साथ ही भुला दिया जाएगा ! हर बिना धुले कपडे की एक कहानी होती हें !! . . राजू का मिटटी से सना स्कूल का नीला शर्ट बता रहा हें कि आज उसने खेला है फुटबाल क्लास छोड़ कर ! कुछ भीगी सी आस्तीने गवाह हें कि पसीना फिर उसने बाज़ुओ से ही पौछा है ! . पड़ोस कि आंटी की लखनवी डिजाईनर साड़ी पर लगे सब्जी के निशान बता रहे है भोज में आये मेहमानों कि भूख को ! रोज़ मोहल्ले का डान बनकर घूमने वाले महेश कि शर्त फटी हुई हें आज, वो पिट कर लौट रहा है या हवालात से ! . बड़े भैया के एक बाजू से महक रहा है जनाना इत्र, उस लड़की का जिसके हाथ थाम जनाब सिनेमा देख आये हें ! पिताजी का सिलवटो और पसीने से भरा शर्ट हिसाब देता हें उन पैसो का, जो हम बेफ़िक्री से उड़ाते हें ! माँ की साड़ी में गंध और कालिख हें कोयल...
ये iit की जिंदगी, सोने का यहाँ नही ठिकाना। आज freshizza कल परीक्षा, हे ईश्वर तू मुझे बचाना।। सबसे पहले हम कोटा जाए, bansal में funde चमकाए, दो साल तक वाट लगाकर, iit फोडू कहलाये। खेलो का कुछ नाम नही था, दिनभर काम आराम नही था, यहाँ आकर फिर किस्मत फूटी, वो ही किस्सा वही फ़साना। हे ईश्वर तू मुझे बचाना॥ हॉस्टल के कमरे हे इसे, चिडियाघर के पिंजरे जैसे, बाथरूम में लाइन लगाओ, देर करो तो लाते खाओ। खाने के बारे में क्या बोले, बेहतर हे हम मुह न खोले, मटर पनीर की सब्जी में तुम, पनीर ढूंढ़ कर मुझे बताना। हे ईश्वर तू मुझे बचाना॥ सात बजे की alarm जगाए। जिसे बंद कर के सो जाए, प्यारे प्यारे सपने बोले, थोड़ा सा तो और तू सोले। lecture में तो टाइम हे भोले, खा ले तू नींदों के झूले, सवा आठ जब नींद खुले तो, उठकर भागम - दौड़ मचाना। हे ईश्वर तू मुझे बचाना॥ भागते हुए क्लास में जाओ, वहा जा कर के फिर सो जाओ, coffee shack से maggie लाकर, कक्षा में उसे मजे से खाओ। professor जाने क्या पदाए, हम तो बस नज़रे दौड़ाए, पूछे मित्र से मार के कोहनी, उस लड़की का नाम बताना, हे ईश्वर ...
कवि तो ख़ुद एक कविता है उसमें अनंत गहराई है , है व्याकुलता , तन्हाई है , ढूंढ सको तो ढूंढ लो , एक ‘ सोता ‘ उसमें कहीं बहता है - कवि तो ख़ुद एक कविता है । दुनिया से बेगाना है , दुनियादारी से अनजाना है , अव्यक्त , उलझे भावों को , वो कागज़ पर लिख देता है - कवि तो ख़ुद एक कविता है । शब्दों की भी सीमायें हैं , कविता में कुछ अंश ही आयें हैं , सागर से निकली इन बूंदों में भी , कितना कुछ वो कहता है , कवि तो ख़ुद एक कविता है । उन शब्दों को हम ना ताकें , गर उस हलचल को पहचान सके । क्या कहना आख़िर वो चाहता है , उन अर्थों को हम जान सकें , बेचैनी , उमंग नीरवता को भी , वो लफ्जों में कह देता है । कवि तो ख़ुद एक कविता है । कविता तो एक माध्यम है , आख़िर तो कवि को पढ़ना है । कलम की इस सीढ़ी से , उसके ह्रदय तक चढ़ना है । वहाँ पहुंचोगे तो पाओगे एक कलकल करती सरिता है । कवि तो ख़ुद एक कविता है । ऋषभ जैन
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Thank You :)