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Thursday, September 9, 2010

Commentary

जिंदगी की पारी में वक्त है बल्ला टांगने का !
लोग कहते है कि में भूल जाऊं,
वो तेज तर्रार शाट लगाना !
वो नाचती सी फिरकी गेंदे फेकना !
मुश्किल गेंदों को गिरते फिसलते हुए से पकड़ना !
भूल जाऊ वो,
अच्छी पारी के बाद बल्ला हवा में घुमाना
और मैच हारने के बाद सर झुका मायूसी से लौटना !
भूल जाऊ उन दर्शकों को,
जो एक शाट पर तालियाँ
और एक गलती पर गालियां देते है !
साथ ही भूल जाऊं उन बूढ़े commentators को,
जो खुद भी कभी खिलाडी हुआ करते थे !
जिनकी सीखें और सबब आज कोई नहीं सुनता !
जो कांच के बक्सों में बैठे,
अनमने से कुछ उबाऊ सा बतियाते रहते है !!
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आज कुछ साल बीत गए हें बल्ला टाँगे हुए !
अब कोई सुनता नहीं हें मेरी भी !
तजुर्बा अलमारी कि ऊपरी सतह पर रखा सड़ रहा हें !
कही अब वो पुराने दोस्त मिलते हें तो,
जिंदगी के मैच कि ज़रा commentary कर लिया करते हें !!
Rishabh Jain

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