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मुलाकात

यूँ तो मिलने की अक्सर कोई वजह नहीं होती, 
पर इत्तफाकन यूँ मुलाकातें, बेवजह नहीं होती । 
तेरे ख्वाब में ही जागा हूँ बे-सबर मैं रात भर, काश उजले ख़्वाबों में कभी शब् नहीं होती । 
करिश्मा-ए-कुदरत की कुछ सियासत रही होगी,
वरना पहली ही नज़र यूँ मोहब्बत नहीं होती । 

फासला है उम्र भर का और साथ तुम नहीं,
काश बेज़ार ऐसी ज़िन्दगी लम्बी नहीं होती ।

इश्क के बाज़ार में क्यों बैठा है तू 'आशिक',
 टूटे हुए टुकड़ों की यहाँ कीमत नहीं होती ।

ऋषभ

अज्ञात

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अबतक,

भागता रहा हूँ, उनके पीछे,  जिनके चेहरे नहीं थे|

ना जाने कितने दिलचस्प किस्से और नायब इंसान, पीछे छूट गए ||    

Mirza Ghalib Episode 1 (Doordarshan) Deciphered

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मेरी एक दोस्त है। टेढ़ी-मेढी पर दुनिया को सीधा करने की चाहत रखती है। अक्सर तोहफे देती रहती है। हर एक नायब, खूबसूरत । एक एक कर अब खोल रहा हूँ उन्हें। परत दर परत, रहस्यों से भरे तोहफे। हर एक में डूबते चले जाओ।ज़रा जटिल है ये ।  कोशिश है, मेरे जैसे लोगों की परेशानी हल हो। लुफ्त उठाएं वे भी इन नायब तोहफों का।

गुलज़ार साहब ने अपने निर्देशन और  नज्मों  से सजाया है, जगजीत ने मखमली आवाज़ दी है और नसीरुद्दीन शाह की अदायगी ।

सहुलिय (अपनी) के लिए अंगरेजी का प्रयोग किया है। माफी । जिस क्रम में शेर/ ग़ज़ल/ नज़्म और शब् आते गए मैं उन्हें जमाता चला गया| इसे संगठित करने में मैं कई एनी refrences का प्रयोग किया है उनका आभार | कहीं गली नज़र आये तो टिप्पणी में ज़रूर बताये |


Mirza Ghalib Episode 1 Video link- Mirza Ghalib episode 1 You tube


देखते जाए, और जहां अटकें पढ़ते जाए ।   Hain aur bhee duniya mein sukhanwar bohot achche Kehte hain ki ‘Ghalib’ ka hai andaaz-e-bayaan (way of description) aur Sukhan – Poetry Sukhan-war - Poet andaaz-e-bayaan - way of description
Ballimaran ke mahalle ki wo pechida daleelon …

तो क्या बात हो

अंधेर, मायूस, सहमी, लम्बी एक रात हो. 
सूरज निकले अचानक, तो क्या बात हो| 

चेहरे की किताब पर तो पहचान बहुत है, कुछ इंसान भी जाने, तो क्या बात हो| 
जब से होश संभाला, बेइंतेहा प्रेम है तुमसे,  मालूम हो जाए तुम्हें भी,तो क्या बात हो| 
माना तेज़ है, आसान भी - ईमेल, पर गोया, चिट्ठी कोई लिख जाए, तो क्या बात हो ||