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Sunday, December 9, 2012

शेर

आशिक:जिन्हें मेरी चाहत से ऐतबार नहीं है,
ऐ खुदा! हमें भी उनसे प्यार नहीं है| 

खुदा: इसमें होता नहीं है सौदा लेन देन का,
ये मुहब्बत है बंदे, कोई व्यापार नहीं है | 

~~ऋषभ~~

Friday, November 16, 2012

वक्त

बेटा!
क्यों घर नहीं आता ?

पापा!
वक्त नहीं मिलता|

बेटा!
कुछ वक्त बचाया था,
अपने बुढापे के लिए,
ज़रूरत हो तो ले जाना'
यहाँ बेमतलब रखा है|

गुनाह

गुनाह करना 
जिस देश में 
गुनाह नहीं ||
उस देश का मैं 
गुनेहगार हूँ ...
मैं ईमानदार हूँ ||
~~Rishabh~~

दीपावली ...०

दीवाली पे घर जाएँ कैसे ?
हमरी रेल का कुछ ये है हाल ...
सारी रात लगो लाइन में,
फिर भी कहलाता तत्काल 

दीपावली ... २

हज़ारों का बारूद,
पल में जला गए |
सड़क पे भूखी बच्ची,
क्यों नहीं दिखी?

एक ओर तो लौ 
जला के रक्खी है, 
फिर रोशनी उससे,
क्यों छुपा रखी?

उसके नसीब में क्या,
बस धुंआ है जश्न का,
उसके नसीब में क्या,
बस उत्सव का शोर है,

शायद ... Who cares!

दीपावली ... १

तेरा घर तो है रोशन,
क्यों दीये जलाता है?
जो अँधेरे करो रोशन,
तो सफल दीवाली हो|

~~Rishabh~~

ज़िंदा

तुम्हें देखा आज,
एक ज़माने बाद,
.
कुछ देर 
साँसे अटकी, 
फिर, 
दिल धडकने लगा, 
.
मैं ज़िंदा हूँ अबतक ,
ये लगने लगा|| 

~~ऋषभ~~

वक्त, तब और अब

एक वक्त था, 
हम छोटे थे ...

थोडा डर था, कुछ चिंता थी,
सपने भी थे, आशंका भी, 
कुछ उसूल तब हुआ करते थे,
बेमन पर मना किया करते थे|
.
नए चेहरों से कतराते थे तब,
इम्तिहानों से घबराते थे तब,
दस्सी लगने पर इतराते थे तब,
लड़ते भी थे, चिल्लाते भी थे तब,
.
क्लास टाइम पे जाते थे,
लाइब्रेरी में मगने आते थे,
हर इम्तिहान हमें डराता था,
सारी रात जगाता था,
.
सीनिअर तब 'फंडे' दिया करते थे,
घोड़ा-गिरी हम किया करते थे,
पेफ में लेई लगाते थे तब ,
होस्टल चीअरिंग को जाते थे तब,
.
उठकर रोज़ नहाया करते थे,
मरीन ड्राइव जाया करते थे.
हर बंदी को देखा करते थे,
कुछ कहने से लेकिन डरते थे,
.
कुछ बातें,
अब भी है वैसी ,
.
लेकिन ...
.
अब रातों को उतना
'लुक्खा' नहीं काटते,
घर का खाना चुराने
पर उतना नहीं डांटते|
.
अब एंड-सेम से उतना डरते नहीं है,
क्रिकेट स्कोर पर उतना लड़ते नहीं है|
.
अब हर दीवाली पे घर नहीं जाते,
पुराने दोस्त अब उतना याद नहीं आते,,
फोन पे अब घंटों बतियाते नहीं है,
दिल की बात दोस्तों को बताते नहीं है |
.
कुछ और अब दिखता नहीं,
खुद में हम इस कदर खो गए है,
या फिर शायद ....
हम बड़े हो गए है||

Monday, November 5, 2012

फूल


फूल,
खिलते है,
महकते है,
मुरझाते है,
बिखर जाते है|
.
लेकिन, इक
दिया था जो तुमने,
कई साल पहले ...
.
मेरी डायरी रखा,
वो आज भी ज़िंदा है ||

Monday, October 29, 2012

माँ


रात भर कल,
खोजता रहा नींद को ...
.
और वो छुपी बैठी थी,
माँ तेरी गोद में||



Thursday, October 25, 2012

वक्त


बेटा!
क्यों घर नहीं आता ?

पापा!
वक्त नहीं मिलता|

बेटा!
कुछ वक्त बचाया था,
अपने बुढापे के लिए,
ज़रूरत हो तो ले जाना'
यहाँ बेमतलब रखा है|


Tuesday, August 28, 2012

एक कलाम, जगजीत के नाम


ग़मों पर सरगम सजा,
वो धुन सुनाता रहा,
जुबां ने चुप्पी साध ली,
वो ग़ज़ल गुनगुनाता रहा।

वो इश्क भी एक झूठ था,
झूठे उम्र भर के वायदे,
जिनके शहर थे उजड़ गए,
उनके घर बनाता रहा।

तेरे हुस्न की बारीकियां
तेरे होंठों से नजदीकियां,
लगा सामने तू आ गया,
वो ग़ज़ल सुनाता रहा।

जब शोर में संगीत था,
और संगीत में शोर था,
तूफानी वो दौर था,
वो कश्ती कागज़ की चलाता रहा।



Friday, August 17, 2012

बापू! अब मत आना


२१वी सड़ी ने धरती पर कदम रखा ही था| बदलाव की आंधी संस्कृति और संस्कारों को उड़ा रही थी |इस बदलाव से स्वर्ग भी अछूता ना रहा| वीणा के सुरों के स्थान पर अब इलेक्ट्रिक गिटार का 'बेकग्राउंड म्यूजिक' बजने लगा|मेनका की जगह 'ब्रिटनी' अप्सराओं की 'रोल मोडल' बन गयी और जो नेता यमराज को रिश्वत देकर वहां पहुंचे थे, वे अपनी अपनी पार्टी बना इंद्र की कुर्सी के लिए लड़ने लगे|

इन सब के बावजूद 'बापू' तटस्थ रहे| लेकिन एक दिन बापू का चरखा 'ओल्ड फैशंड' बता कर स्वर्ग से फेंक दिया गया| उनका मन उचाट गया| उन्होंने सत्याग्रही अनशन करने की कोशिश की तो अप्सराओं ने ज़बरदस्ती अंगूर खिला दिये| अंततः तंग आकर बापू स्वर्ग त्याग दिया | वे अपने प्यारे आज़ाद भारत को देखने पृथ्वीलोक आ गए और मुंबई घूमने लगे|

चारों ओर ऊँची इमारतें, तेज़ भागती गाड़ियां, माल सब उनकी कल्पना से परे था| उन्हें गर्व हुआ भारत की तरक्की पर| जगह जगह उनके स्मारक, मूर्तियाँ , रास्तों के नाम, नोट पर तस्वीर देख बापू का अचम्भा और बढ़ गया| सोचा चलो भारत सही रस्ते जा रहा है|

अचानक दो युवक उन्हें देख रुक गए, पहला  बोला -"भाई मुझको बापू दिखरेले है|" दुसरे ने जवाब दिया "मुझे भी दिखरेले है बाप, जरूर कोई केमिकल लोचा है|" बापू की समझ में कुछ नहीं आया| कई लोग उनके पास आकर तस्वीरें लेने लगे, कई औटोग्राफ मांगने लगे| बापू बड़े खुश थे|


रात में एक अँधेरी गली से बापू को किसी महिला की मदद की गुहार सुनाई दी| कुछ नशे में धुत्त युवक एक युवती के साथ अभद्र व्यवहार कर रहे थे और भीड़ दूर खादी तमाशा देख रही थी| सबकी जुबां पे ताला, हाथों में जंग| किसी में हिम्मत नहीं थी गलत को रोकने की| बापू ने युवकों को समझाने की कोशिश की तो उन्हें धक्का दे कर गिरा दिया गया| कोई मदद को नहीं आया| कुछ तो हंसने लगे "सिरफिरा| गांधीगिरी करने चला था|" बापू के भ्रम पलभर में टूट गए|

उन्होंने बारीक नज़र से चरों ओर देखा| क्या देश सच में आज़ाद था? 

हाँ, कहने को मुल्क आज़ाद था| लेकिन मानसिकता पराधीन थी| लोगों ने अपना ज़मीर, ईमान, हिम्मत सब गिरवी रख छोड़ा था| ना सच का साथ देने कि हिम्मत थी, ना अत्याचार का सामना करने की| जब तक खुद पर ना बीते किसी की जुबां से लफ्ज़ ना निकलता था| अफसर कर्म से, नेता शर्म से और कौमें असली धर्म से आज़ाद थी| अमीर न्याय से,अभिनेत्री कपड़ों से और संसद जवाब देहि से आज़ाद थी| व्यापारी मिलावट को आज़ाद थे, उद्योगपती घोटाले करने को| डूबता देश अब किसी का नहीं था| सभी दूसरों की ज़मीं खोद अपनी इमारत ऊँची करने में लगे थे| अब मशाल थमने वाला कोई ना था| अगर कोई कोशिश करता भी तो खुद दलदल में धंसता चला जाता|

बापू ने दर्द में आँखें मूँद ली| काश वे धरती पर लौटे ही ना होते| उन्होंने अपनी लाठी संभाली और धीमे क़दमों से आसमान की ओर चले गए| 

--

Sunday, August 12, 2012

ग़ज़ल


जो बयान जुबां से हो जाए, वो आशिकी क्या है?
जो होश में कट जाए, वो ज़िन्दगी क्या है?


देखा  है  नूर  तेरा, हर  ज़र्रे  में  कायम,
जो नज़र मंदिर में ही आए, वो बंदगी क्या है?


कसम याद में मेरी, आँसू ना बहाना,
जो अश्कों में बह जाए, वो बेबसी क्या है?


ना जुबां पर शिकायत, ना चेहरे पे शिकवा,
जो पराये समझ जाए, वो बेरुखी क्या है?  


हर मोड़ पर, इस शहर में, आशिक बहुत तेरे,
जिसे तारों ने ना घेरा, वो चांदनी क्या है?


अधूरी गज़ल


रात आधी, बात आधी, एक जाम है आधा,
मैं अधूरा, तुम अधूरी, शब् पर चाँद है आधा||

मुझसे मिलकर ही तो, हो पाएगा पूरा,
है सुन्दर बहुत लेकिन, तेरा नाम है आधा |

पुरानी चोट है दिल में, दवा रोज़ पीता हूँ,
आधी हुई है ख़त्म, बचा अब दर्द है आधा|

फिसल के हुस्न पर तेरे, सज़ा का हकदार मैं बना, 
पर सज़ा की तू भी है हकदार ,तेरा गुनाह है आधा |
 
 

Monday, July 30, 2012

सांझ होने को है

सांझ होने को है,

दूर क्षितिज पर, 
सूरज अलविदा कह, 
हो रहा है रुखसत। 

अब भागना है,
बेतहाशा, 
पकड़ने को सूरज।

सफ़र आसान नहीं,
लेकिन सफल रहा तो,
जिंदगी बीतेगी रोशनी में।

अब थक गया, थम गया तो...

सांझ होने को है ||


Saturday, June 30, 2012

क्या होगा इस देश का?


भारत एक विकाशशील देश है| यहाँ खान-पान. पहनावा, विचारधाराएं, सरकार एवं  रेल मंत्री सभी वक़्त और फैशन के साथ बदलते ही रहते है| एक मात्र अटल है, शाश्वत है, सार्वभौम है, सर्वव्याप्त है वो है एक सवाल - क्या होगा इस देश का? दार्शनिक, विचारक, ज्ञानी- अज्ञानी, नेता- अभिनेता,आम आदमी सभी इस सवाल के पीछे अपना सर खुजाते फिरते  है| रेल के डिब्बे से राजपथ तक, अस्पताल से शमशान तक, बीडी की दूकान से पांच सितारा होटल तक लहजा बदल बदल के ये प्रश्न घूमता रहता है| कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही  सवाल भाषा बदल-बदल कर दोहराया जाता है|  अनेकता में एकता का इससे जीवंत उदाहरण शायद की कहीं देखने को मिले|

गोया ये सवाल इतना प्रचलित है के बस में बगल में बैठे नव-परिचित से लोग नाम बाद में पूछते है पहले ये सवाल दाग देते है - भाई साहब! क्या होगा इस देश का? जानते हुए भी कि अगले के पास इसका जवाब नहीं| असल में इसका जवाब कोई जानना ही नहीं चाहता| सवाल में ही इतना रस है कि लोग उसी में डूबे रहते है| अब बिना किसी डर के किसी के नुक्स निकाले जा सकते है तो वो देश ही तो है|  हर छोटी- बड़ी समस्या के बाद इस सवाल को जोड़ दिया जाता है, जैसे सवाल ना हो तकिया कलाम हो| मसलन सुबह अखबार देर से आये - क्या होगा इस देश का? अखबार में मूल्य वृद्धि के खबर छप जाए-क्या होगा इस देश का ? बिजली चली जाए, घर पर पानी ना आए, घरवाली  गुस्से में धमकाए, वक़्त पे बारिश ना आए ... हर मर्ज़ पर यही सवाल| अब भले-मानुष को कौन समझाए कि तुने बिजली का बिल नहीं भरा, बिजली काट दी, इसमें देश का क्या दोष| खैर जबतक सवाल से काम चलता हे, चलनें दे| 
ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब कोई नहीं जानता| सरकार शायद जानती है लेकिन बताती नहीं| इसलिए जो लोग जोर-शोर से चौराहों पे, सभाओं में माइक लगा कर ये प्रश्न पूछते है उन्हें जनता चुनकर संसद में भेज देती है| इस उम्मीद में के सरकार में जा कर ये इस सवाल का हल खोजेंगे,बताएंगे| लेकिन गोपनीयता कि शपथ लेते ही वे चुप्पी साध लेते है और सवाल बवाल मचाता रहता है| लोग प्रधानमंत्री जी से पूछते है -इस देश का क्या होगा? जिन्हें ये भी नहीं मालूम के अगले दिन उनके पद का क्या होगा वे भला देश का भविष्य क्या बताएंगे| 

इस सवाल कि अक्सर दो प्रतिक्रियाएं होती है, जिनके द्वारा आप उस व्यक्ति  के मानसिकता जान सकते है| निराशावादी या स्पष्टवादी व्यक्ति लम्बी आह भर के कहेंगे -इस देश का कुछ नहीं हो सकता| वहीँ सकारात्मक स्वप्निल व्यक्ति कहेंगे देश आगे बढ़ रहा है, प्रगती कर रहा है इत्यादी, इत्यादी | पीढी दर पीढी ये सवाल धरोहर के तरह सौंपा जाता है| चाहे जनरेशन गेप कितना भी हो    दादा - पोते इस विषय पर चिंतन अवश्य करते है|

खैर सवाल जस का तस है - क्या होगा इस देश का?

अब मैंने इतना बड़ा आलेख लिखा| कागज़ बर्बाद  किया| आपने भी पढ़ा, सहमती में सर हिलाया, करा धरा कुछ नहीं| ना कोई नतीजा, ना ही मुनाफ़ा| हे भगवान्! क्या होगा इस देश का|


-- 
Rishabh Jain

Friday, May 25, 2012

प्रश्न कविता से

 इस दिन फुर्सत में,
कविता से पुछा मैंने-
"क्या खामी है मुझमें ?
तू क्यों नहीं रहती
मेरे लिखे पन्नों में ?"

फिर खुद ही जवाब दिया-
"शायद मेरे शब्दों का घर
बड़ा नहीं है,
या वे इतने संपन्न नहीं,
जो रहने लायक हों तेरे|
या क्योंकी मैं प्रसिद्द नहीं,
मेरी नाम में
निराला, वर्मा या पन्त नहीं|
आखिर क्यों दूर है मुझसे?"

कविता हँसकर बोली-
"रे पगले!
मैं तो हमेशा तेरे दिल में रहती हूँ,
जिस दिन कलेजा अपना 
कागज़ पर रख देगा
तेरे पन्नों में भी बस जाउंगी|" 

Tuesday, May 1, 2012

वो वक्त ही कुछ और था...


क्यों अब बारिशों में भीगते नहीं?
क्यों बादलों में अब चेहरे नहीं ढूंढते ?
क्यों दौड़ते नहीं तितलियों के पीछे?
क्यों लेटकर ज़मीं पर अब सितारे नहीं साधते ?

पहले बुझ जाती थी पलक झपकते ही.
क्यों शामें वो अब छोटी नहीं लगती?
लंबी कहानी दादी की जो सवेरे खत्म होती थी,
राक्षस, राजकुमार में क्यों अब लड़ाई नहीं होती?

क्यों दोपहर में घंटी की आवाज़ पर चौंकते नहीं है?
पेड़ की टहनियों पर क्यों झूलते नहीं है?
सुबह नाराजगी, तो सुलह शाम मे हो जाते थी..
उन रंजिशें को क्यों अब भूलते नहीं है ?

क्यों माँ से अब चम्पी नहीं कराते?
क्यों पिताजी के साथ मेले नहीं जाते?
क्यों नानी के हाथ से मेवे नहीं खाते?
क्यों बड़ों से अब आशीष नहीं पाते ?

गीली मिट्टी में बनाते नहीं है टीले,
ना बटोरते है पत्थर रंगीले,
अब चीटियों की कतार का पीछा नहीं करते,
जानवरों की आवाजों को सीखा नहीं करते,

वो वक्त ही कुछ और था...

अब काम के बोझ तले,
वक्त को बहने देते है ...
तब काम पिटारी में रखकर,
वक्त में ही बह जाते थे ...

वो वक्त ही कुछ और था ... क्योंकी.अब ..

माँ अब सुबह प्यार से उठाती नहीं है ... 
दादी भी लोरी गा कर रात में सुलाती नहीं है ... 

वो वक्त ही कुछ और था ...
                

Sunday, April 29, 2012

तस्वीर

पुराने बंगले में, पीछे,
एक लंबा, खामोश गलियार है।
ठंडा और सीलन भरा,
हवा तक कतरा के जाती है।

बेरंग दीवारों पर,
रंगहीन तस्वीरों की कतार,
जाने कब से टंगी है।

सर्दी में,
पीपल के पत्तों से बचकर, रोशनी,
अधखुली खिड़की चढ़कर ,
अन्दर आ जाती है,
कोशिश करती है,
तस्वीरों को रंगने की।


पुराने बंगले में, पीछे,
एक लंबा, खामोश गलियार है।

फुरसत में इक दिन,
कदम गए उस ओर,
देखा तस्वीरों को निहारता,
वक़्त मायूस सा खड़ा है।

वजह पूछी तो, जवाब मिला,
"क्या बताऊँ दोस्त! ...
... आजकल वक़्त कुछ ठीक नहीं।"


     

Sunday, April 22, 2012

ये ज़िंदा लाशों का शहर है

ये ज़िंदा लाशों का शहर है। 

ठहरी हुई ज़िन्दगी थामकर 
लोग रोज़ भागते है,
किस और भागते है, क्या खबर ?
मंजिल दूर ही रहती है ...

खुद गुमशुदा रास्ता दिखाते है,
अंतहीन इस भूल-भुलैया में
रोशनी में रास्ता दिखता नहीं,
अंधेरों में रोशनी तलाशते है ...  
ये ज़िंदा लाशों का शहर है।


घड़ियाँ यहाँ मनमौजी है,
कभी दौडती बेसुध, कभी थम सी जाती है ..

फुर्सत में आइना अजनबी लगता है,
न जाने कौन ? 
सफ़ेद बाल, झुरियां थकी सी,
कल तो उसपार एक नौजवान रहता था।

आग जलती रहे अगली सुबह भी 
इस कोशिश में,
रंगीन पानी में हर रात डुबाते है .. 
ये ज़िंदा लाशों का शहर है।



यहाँ शोर में खामोशी है,
पर सनातों का शोर है ...
आँख खोल कर सोते है,
जागते बंद आँखों से ...

हकीकत बेच कर यहाँ
सपने खरीदते है लोग ...
उगती शामों में परिंदे,
घर नहीं लौटते,
ना ही माँ इंतज़ार करती है ..
चूल्हे की आग ठंडी सी है।
ये ज़िंदा लाशों का शहर है।


लो इस अजीब शहर में, 
एक सुबह फिर 'डूब' गई ।



Sunday, April 8, 2012

शोक-समाचार - 'संयुक्त प्रवेश परीक्षा ने ली अंतिम सांस'


संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई)
(9 अप्रैल 1960 – 8 अप्रैल 2012)

लंबे समय से कपिल चप्पल की मार झेल रही 'संयुक्त प्रवेश परीक्षा' ने अंततः 8 अप्रेल, सांयकाल 5 बजे दम तोड़ दिया| आप 52 वर्ष के थे|

आप प्रारम्भ से ही बड़े सख्त मिजाज थे| बच्चों के देखकर ही आपका पारा चढ जाता और आप उन्हें डराने धमकाने लगते| फलस्वरूप छोटे बालकों में आपका आतंक व्याप्त हो गया| लेकिन बढ़ती उम्र के साथ आपके मिजाज़ में कुछ नरमी आई|

'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' के साथ लगभग तीस वर्षों तक आपके मधुर वैवाहिक सम्बन्ध रहे| जिसके फलस्वरूप अपनी युवावस्था में आपके सात पुत्र हुए| सभी ने बड़े होकर अलग-अलग शहरों में अपने पिता का नाम रोशन किया| लेकिन इतने से उनकी सांसारिक इच्छाएँ खत्म नहीं हुई| अपनी ढलती उम्र में भी आपने 'फाईट मार कर' आठ कमजोर-कुपोषित बच्चों को जन्म दिया| ऐसा प्रतीत हुआ मानो वे 'क्वालिटी' की बजाए 'क्वांटिटी' पर ज्यादा ध्यान दे रहें है|

बाद में आपका रुझान कोटा नामक 'कोठे वाली' की तरफ बढ़ने लगा| उनकी पत्नी (मानव संसाधन विकास मंत्रालय) ने कोटा से उनका पीछा छुड़ाने के लिए 2006 में  उनका पूरा हुलिया ही परिवर्तित कर दिया| लेकिन कोटा ने उन्हें फिर भी पहचान लिया और तब से उनके सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ हो गए| अंततः कोई चारा ना देख उनकी पत्नी ने अपने 'सीरिअल किलर - खूंखार दरिंदे – राजनेता भाई' कपिल चप्पल के साथ मिल कर अपने पतिदेव 'जेईई' के क़त्ल की साजिश रची| अपनी राजनीतिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए 'श्री चप्पल' ने 2010 में 'जेईई' पर घातक हमला किया तब से वे जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे|

लेकिन जेईई के आई.सी.यु. में भर्ती रहने के दौरान ही उनकी पत्नी 'मंत्रालय' ने ISEET नामक अज्ञात शख्स के साथ अपने संबंधों का खुलासा कर दिया| उन्होंने ये भी घोषणा कर दी की 2013 में वे परिणय सूत्र में बंध जाएंगे| मृतक जेईई के १५ बच्चों के साथ अब सौतेला व्यवहार होने की आशंका है|

लेकिन लगता है 'मंत्रालय' की खुशी अधिक दिनों तक नहीं टिकने वाली क्योंकी 'कोटा' नामक उसी 'कोठे-वाली' ने अभी से उसके मंगेतर ISEET पर डोरे डालने शुरू कर दिए है|

शोकाकुल आई.आई.टी बोम्बे, आई.आई.टी दिल्ली, आई.आई.टी कानपुर एवं समस्त आई.आई.टी परिवार|

(इस आलेख का उद्देश्य किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है, और अगर आपको ठेस पहुचती है तो इसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा ... सायोनारा)


Thursday, March 1, 2012

एक चोमू था ...


[ये छोटी सी कहानी ठीक दो साल पहले मैंने होली पर लिखी थी, इस कहानी के पात्र प्रेरित है लेकिन घटनाएं काल्पनिक ... शायद]

एक चोमू है| अंडाकार मुँह, सामान्य कद-काठी, सर पर खिचड़ी से बाल, सुनहरे फ्रेम का चश्मा और चेहरे पर नेताओं वाली मुस्कान| मुझसे तीन कमरे छोड़ कर वो अकेला रहता है या यह कहना बेहतर होगा कि अकेला कर दिया गया है| जब रोज़ सुबह बरामदे के आखिर कमरे से में उनींदी ऑंखें लिए निकलता हूँ तो चोमू नहा कर लौट रहा होता है| एक हाथ में बाल्टी थामे, दूसरा हाथ उठा कर आते हुए लोगो को 'गुड मार्निंग' बोलता है| लेकिन आठ महीने बीते किसी ने शायद ही उसे पुनः अभिवादित किया हो| मेरे पास से गुजरते हुए आशाभरी नज़रों से वो मुझे भी देखता है और मैं नींद में होने का बहाना कर पैर घसीटता आगे बढ़ जाता हूँ|

होस्टल का हर दिन एक उत्सव है| हँसी- मजाक, गप्पे, क्रिकेट, ताश और वक्त मिला तो पढ़ भी लिए| लेकिन चोमू के लिए ये उत्सव मात्र देखने का तमाश है| गुजरते हुए चोमू को लोग कुछ इस तरह अनदेखा कर देते है जैसे खामोश हवा, जिसकी उपस्थिति को लोग महसूस तो करते है पर देख नहीं पाते| अगर कभी उसने हिस्सा लेना भी चाहा तो उसी वक्त सभी को कुछ आवश्यक काम याद आ जाता है और चोमू फिर अकेला रह जाता है| चेहरे कि हँसी गायब है, गुमसुम, उदास, अकेला | एक अकेला आँसू आँख का बांध तोड़कर उसके गालों से बह चला, मानो वो भी उसका साथ छोड़ चला हो|

स्थितियाँ हमेशा से ऐसी नहीं थी| उसका असली नाम आनंद है| आनंद यादव|
तब सभी नए थे, देश के हर कोने से, अलग – अलग आर्थिक, पारिवारिक स्थितियाँ| सभी ने ध्यान  एक दुसरे को परखने, जांचने और तालमेल बिठाने में लगा दिया और जल्द ही सभी के समूह और दोस्त बन गए| लेकिन आनंद किसी समूह में ना था| शायद वो खुद को खास समझता था, मिजाज़ में अकड़पन और घमंड| हमने बात करने कि कोशिश की, ज़रा समझाया भी पर कोई असर नहीं| इसी सिलसिले में बात ज़रा बढ़ गयी| आनंद के व्यवहार ने भी आग में घी का काम किया| जल्द ही सब आनंद से नफरत करने लगे| उसके कमरे के बाहर बड़े बड़े अक्षरों में चोमू लिख दिया गया और कमरों की लंबी कतार से एक कमरा उसमे रहने वाले के साथ काट दिया गया|

इस तरह आनंद चोमू बना और आज तक जो हो रहा है वो उसी का नतीजा है, शायद यही चोमू चाहता था |

आज होली है, वो दिन जब सारे गुनाह रंगीन पानी से धो दिए जाते है|

हम सभी चितकबरे रंगों में सजे एक दुसरे पर रंग-गुलाल उड़ा रहे थे| लेकिन चोमू के चेहरे पर रंग की एक रेखा भी नहीं| उसके सफ़ेद शर्ट पर कुछ रंग भरे हाथों के निशाँ ज़रूर थे, जो शायद जानबूझ कर लोगो के गले मिलने से बने थे| लोग मस्ती में इतने उन्मुक्त थे के शायद उससे दूर भागना भूल गए थे, पर फिर भी उन्हें इतना याद था कि चोमू को रंग न लगाया जाए| आखिर वो कितनी कोशिश करता| उसका घमंड तो बहुत पहले ही हार चुका था, आज चोमू खुद भी हार गया| किसी ने नहीं देखा पर वो आँसू पोंछता हुआ बरामदे से बाहर निकल गया| अनजाने में ही उसने हाथों में लगे रंगों से अपना चेहरा खुद ही रंग दिया था| बरामदे के आखिरी सिरे पर खड़ा मैं यह देखता रह गया| मुझे खुद पर शर्म आ रही थी| एक घुटन भी, मानो एक गहरे सच में अचानक डूबाया गया हो| 

ये हम क्या कर रहे है? अगर ये सब मेरे साथ हो रहा होता तो मैं शायद आंसुओं को छुपाने के काबिल भी ना रहता| घर से कई सौ मील दूर अगर आज भी कभी माँ की याद आती है तो दोस्त की गोदी में सर रख सो जाता हूँ| वहीँ शायद वो रात भर जागकर ठंडा तकिया और सीलन भरी दीवारें ताकता होगा| दोस्तों के बिना हर लम्हा एक सजा है फिर यहाँ तो आठ महीने बीत चुके है| वक्त के थपेड़े पहाड़ों को भी घिस देते है फिर चोमू तो इंसान है| वो शायद बदल गया है| हमने उसे एक बार चोमू तो बना दिया लेकिन फिर कभी आनद बनने का मौका ना दिया|

मैं कसम खाता हूँ कल सुबह उठकर खुद उसे 'गुड मार्निंग' बोलूँगा |

एक चोमू था ...


  

Wednesday, February 8, 2012

The formula of Election; ऑस्ट्रेलिया से 'कार-की-ऊन'


(यह लेख मुख्यतः आई.आई.टी. मुंबई के परिपेक्ष पे लिखा गया है, अगर किसी की भावनाओं को इससे ठेस पहुंची हो, तो उन्हें 'नेतागिरी' छोड़ देनी चाहिए।) 

बॉलीवुड में अक्सर फोर्मुला फ़िल्में बनती है| फोर्मुला जिसके सारे रासायनिक तत्व तय है| ढाई किलो का हाथ, चुटकी भर सिन्दूर, एक कुँवारी बहन, मोगेम्बो खुश हुआ और ज़रा सी मुन्नी शीला| हिट फिल्म तैयार| कॉलेज में बिताए गए कुछ साल, हर शुक्रवार पहला शो| लगता है जैसे फिल्में, फ़िल्में ना होकर 'रेडी टू ईट' पैकेट हो| पिताजी कि मेहनत के १०० – १५० रुपये मिलाओ, स्वादानुसार पोपकोर्न, समोसा डालो – लो बन गई फिल्म|


मैं ये सोचता था – ये फिल्म वाले तो बड़े होशियार निकले| नेता देश चलाने का, प्रेमी प्यार जताने का और विद्यार्थी नंबर लाने का फोर्मुला ना ढूंढ पाए, इन्होने ढूंढ लिया| फिर कॉलेज में तीन साल हो गए तो एक और फोर्मुले 'चमका'| आअह .. 'द इलेक्शन फोर्मुला'|  

नहीं| मैं इतना होशियार नहीं| मुझे मात्र समझ आया| मुझसे पहले उम्मीदवारों कि कितनी ही पीढियाँ, उनके दाएँ-बाएँ हाथ, सलाहकार, चमचे, उनके लिए दौड़ने वाले, मचाने वाले और 'पोल्ट' लोग ये फोर्मुला घोल चुके थे| समझ आया तो ठीक, नहीं तो रट लिया| ये धरोहर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे सौपी गई| जीते हुए उम्मीद्वार गुरु बने, सलाहकार बने| उनके गुणगान हुए, उन्होंने आगे ज्ञान बांटा| हारे हुए उमीदवारों ने भी चुनाव-कक्ष के बाहर आकर गहन चिंतन, विचार विमर्श किया| "भाई! फोर्मुला तो याद था, 'अप्प्लाए' करने में ज़रा 'सिली-मिस्टेक' हो गई| देखते है अगले साल कौन रोक पाएगा?" (चुनाव में 'ड्रोपर्स' काफी अच्छा प्रदर्शन करते है|)

चुनाव से कुछ महीने पहले ही लोग 'कोचिंग' में जाने लगते है| बड़े-बड़े गुरुओ, मेंटरों के गुरुकुल में भर्ती को लाइन लगती है| एक बार उनका आशीर्वाद मिल जाए, फिर तो जीतना तय है| अब जिनका सलेक्शन सीट पहले ही भर जाने के कारण ना हो पाए, वो छोटे-मोटे अध्-ज्ञानी, हारे हुए गुरुओं के यहाँ कोचिंग लेता है, हो सके तो दो-तीन जगह भर्ती हो जाते है|

आगे शुरू होती है लंबी पढ़ाई| युनिफोर्म्स पहनी जाती है, कड़क प्रेस शर्ट अनिवार्य रूप से| फेसबुक की मोह माया त्यागनी पड़ती है| रोज़ नहाना पड़ता है (कम से कम डियो तो लगाना ही पड़ता है) और ये तो बस कठिन जीवन की शुरुआत है| 

फिर प्रारम्भ होती है असली शिक्षा – 'जमीनी कार्य'| जिन लोगो को साल भर सर उठा के नहीं देखा, चुनाव के मौसम में अचानक उनके भाव बढ़ जाते है| जो मुफ्त में घर आकार पढ़ाते थे, उन्हें कॉल कर-कर के ट्यूशन लेने पड़ते है| ऊपर से हर पेज के बाद 'सरप्राइज़' मिलते है| "अच्छा! ये भी कोर्स में था? "अ...आप अभी तक पढ़ा रहे है क्या? हा हा हा ! हमने सोचा 'रिटायर' हो गए|" अब किसी विषय को ना पढ़ो तो अलग सुनना पड़ता है- "ये कल का छोकरा! समझता क्या है अपने आप को? बिना संगीत को पढ़े चुनाव जीत जाएगा? देखते है कैसे नंबर लाता है|" 

इतना थकाऊ, उबाऊ और पकाऊ कोर्से है कि आधे तो बीच में ही 'गिव अप'| चुनाव लड़ने की बजाए वे 'ई-सेल', 'सार्क' इत्यादि कंपनियों में जॉब कर लेते है| बचे हुए नौजवान अगले स्तर  में पहुँचते है| जहाँ उन्हें बेसिक्स से सबकुछ समझाया जाता है| पके हुए पुराने खिलाडी अपना अनुभव तोल कर उन्हें समझाते है – ""बेटा! 'थ्योरी' तो बहुत पढ़ ली तुने, मेहनत भी बहुत कर ली| पर सच कहूँ 'चुनाव' में बस 'ये फोर्मुला' काम आता है | काम, मेहनत, डेडिकेशन, केलिबर सब पर 'पोल्ट' की बाउंड्री कंडीशन लगा के ये 'फोर्मुला' डिराइव हुआ है|" सारे गुरु अपने-अपने तरीके को सर्वश्रेष्ठ बताते है| कौनसा चले? क्या पता?

फिर ये फोर्मुला हर जगह प्रोब्लम पर 'अप्लाई' किया जाता है| दोस्तों, दुश्मनों, एंटी-केम्प में, केम्पेनिंग, इलेक्शन डिबेट, कौंसिल | 'मुन्नाभाई' टाइप उम्मीदवारों को आनेवाले प्रश्न-उत्तर रटवाने और विपक्ष के डा.आस्थाना से बचाने के भी भरसक प्रयास होते है| पोल्ट के सेकेंड टायर लोग (सोफीस), नए लड़कों (फ्रेशीस) को हर और दौड़ा देते है, "जाओ आज हर मटके को पानी पिला के आओ, फॉर-अ-चेंज, उम्मीदवारों के पेपर मटके ही चेक करते है| मार्च-पास्ट १२-१३-१४! १२-१३-१४!" आधे फ्रेशीस तो यही से 'चुनाव' स्ट्रीम चेंज कर के 'टेक-फेस्ट' या 'मूड-इंडिगो' में चले जाते है| "यार अपना राजेश तो बचपन से 'मचाऊ' है,सुना है 'चुनाव' लिया है| अपन तो पी.टी.सेल में ही ठीक है|"

शर्मा जी, वर्मा जी वार्तालाप करते है- "यु नो! मेरा बेटा पहले 'फिल्म कोष' का अध्यक्ष था,बड़े बड़ों का कटाया है,पोल्टनीति का प्रकांड विद्वान है,जिधर हवा उसी तरफ| देखना ज़रूर जीतेगा|" वर्मा जी- "अजी छोडिये! हमारा पप्पू 'भीतरी समूह' का सदस्य' रहा है, ऑस्ट्रेलिया से 'कार-की-ऊन' लेके आया है, वही जीतेगा|"

और आखिरी कुछ दिन, कभी ओवर-कांफिडेंस मारता है, कभी घबराहट-

"अरे सब आता है मुझे,ये 'कोश्चन' तो बचपन से अपना है, कोई और हिला ही नहीं सकता|"

"प्रश्न ६ में ज़रा दिक्कत है – भाई! संभाल लेना यार, चीटिंग करा देना|"

"क्या बात अन्ना भाई, दिखाई नहीं दियो चलो कुछ खिलाता-पिलाता हूँ आपको, तब तक एक क्वेशन समझा दो यार।"

आपके भाई हर कोने से निकल के प्रकट होने लगते है| खुद पे शक होने लगता है "कहीं मैं पूर्वजन्म का दुर्योधन तो नहीं?" अंततः सुनामी चुनाव आता है, कई लोग बैठते है पर सलेक्ट कुछ लोग ही होते है| 'नो डाउट' एग्जाम टफ है | पर अगर सही फोर्मुला आता है – तो जीत आपकी, चाहे आप केवल 'चित्रकार' ही हो|


(जानकारी के लिए, कार की ऊन पिछले साल १८ दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया से मंगवाई गई थी| यह अब तक कि सबसे महंगी ऊन थी|) 


-:जनहित में जारी:-

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Monday, January 30, 2012

खुदा से खफ़ा

एक और हार,
बढ़ता इंतज़ार,
झुंझलाते लोग,
आखिर क्यों ना चिल्लाए?
जब शिकायत खुद खुदा से हो-
तो हम किसके पास जाए?  

चाँद




रोज़ सांझ ढले आता है चाँद,
पिघलते आसमान पर रात पोंछ जाता है।

पर चाँद आलसी है ज़रा,
कुछ टिमटिमाते नुक्स अक्सर छोड़ जाता है।
  
ऋषभ


       

Friday, January 27, 2012

एक सुबह समीर पर

(२८ जनवरी २०१२ की सुबह, जब सुबह अलसाई सी उठने को थी, दबे पाँव कुछ दोस्तों के साथ में अपनी  कॉलेज के 'समीर पर्वत' पर जा पहुँचा। ये छोटी सी कविता मुझे वही मिली।)

हथेली में सिमटी,कोहरे में लिपटी,
अंगुल भर इमारतों को निगलती धुंध।
एक रास्ता अनछुआ सा।
पिघलती रात में हांफती सी साँसे।
ज़मीन से दूर 
इस आसमां पर पहुँचो, 
तो सुकूँ मिले। 

धुंध को पोंछती,जाड़े की धुप,
थकी हवाओं पर तैरते परिंदे।
किरणों पर सवार,नज़रे अनंत तक।
एक 'विहार' दर्पण सा,ज़रा दूर है,
अक्स दिखता नहीं ।
ज़मीन से दूर 
इस आसमां पर पहुँचो, 
तो सुकूँ मिले। 

आखिर बोझिल पलकों तले,
जब दुनिया को सिमटता पाया,
तू कुछ करीब लगा,
एहसास हुआ, 
इस धरा पर बस मुसाफिर है हम।
ज़मीन से दूर 
इस आसमां पर पहुँचो, 
तो सुकूँ मिले। 


ऋषभ 


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