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Thursday, April 15, 2010

एक फ़रिश्ता

इस अनजान भीड़ में मैने खुद को खोया है,
पत्थर के खेतों में बीजों को बोया है,
इस दुनिया में लोगों के पास ज़ुबां तो है,
लेकिन कान नहीं ,
वहा गीत गाने का ख्वाब संजोया हें!!

तालियाँ सब बजाते है पर वो नाटक का एक हिस्सा है.
प्यार कर बैठते हें लोग पर वो ज़माने का एक किस्सा हें!
ढूंढते रह जाते हें जिंदगी भर एक हाथ थामने को,
क्योंकि विश्वास हें दिल में
खुदा ने छुपाया हमरे लिए भी एक फ़रिश्ता हें!!

1 comment:

  1. अच्छी रचना ..एक सुन्दर प्रस्तुति ...बधाई स्वीकारे

    http://athaah.blogspot.com/

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