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Monday, October 26, 2009


रटन रटन के हम मरे,
रसायनशास्त्र का ज्ञान,
नींद आए क्या गजब,
न होश रहे न ध्यान,

पर झपकी जेसे ही लगी,
पड़ा गाल पे वार,
नालायक बेशर्म कह गुरूजी बरसे,
लिख लाना सौ बार,

लिख लाना सौ बार,
शब्द जैसे ये बोले,
घनघना उठा बदन।
दरवाज़े दिमाग के खोले॥

पिताजी का हाल सोच सोच
मन तरसाया।
क्या गुरूजी पापा का
बेकार में काम बढाया॥
ऋषभ जैन

2 comments:

  1. love this poem Rishabh..keep it up.Will ask Shrey to memorize this

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  2. maje a gaye yaar..got ur blog link frm orkut. ur poems reflect awesome creativity. hope to get to read many more.keep writing!

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