स्वागत

पसंद / नापसंद .. दर्ज ज़रूर करें !

Thursday, December 15, 2011

सत्य मेव जयते

(आज देश के जो हालत है  उनसे कोई अनभिग्य नहीं | सफ़ेद झूट को सच बना कर परोसा  जा रहा है और हम लाचार से सब देख सुन रहे है| सच की जीत अब सिर्फ फिल्मो में होती है, कई बार वह भी नहीं | ऐसे में एक आम आदमी आखिर क्या कहे ? क्या करे ? इस प्रश्न का जवाब भी एक आम आदमी ही दे सकता है ... तो झांकिए अपने भीतर, आप लड़ना चाहते है या डर-डर के मरना चाहते है ... )

इस देश में सच के रखवालों के नाम 
एक युवा का पैगाम  

सत्य वचन की रीत जहाँ थी, जन-मानस की भाषा मे,
प्राण जाए पर वचन न जाएं, था मानव की परिभाषा में |
जहाँ राम ने और कृष्ण ने, असुरों का संहार किया,
यदि शीश है उठा पाप का, मस्तक पर प्रहार किया |
उसी देश के वाशिंदे, अंधी परिपाठी पर झूल गय,
स्वाभिमान तो बचा नहीं गाँधी की लाठी को भूल गए | 
अर्थ नहीं समझते तो क्या, गर्व से हम कहते ...
सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  


गांधी के आदर्शों पर जहां कालिख पोती जाती है,
भूखे बच्चे हर रात जागते, सरकारे सोती जाती है | 
मातृभूमि की दशा देख, शूर पृथ्वीराज शर्मिंदा है,
जहाँ वीरता थी बस्ती, बस जयचंद वह अब जिंदा है |
भारत माता का चीर हरण जहां श्वेत दरिन्दे करते है,
वो रोती चिल्लाती है, हम तमाशबीन बन हस्ते है |
अरे ! रावण यहाँ भोग करते, और राम रोज़ मरते ...
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



जहाँ हाथ में वेद-कुरान, पर दिल में खंज़र होते है,
इश्वर-अल्लाह की शह लेकर , खुनी मंज़र होते है |
जहाँ धर्म के रखवाले, करते इंसानों की खेती,
और अब्दुल से प्यार नहीं कर सकती हिन्दू की बेटी |
यहाँ एकता सहिष्णुता  के टुकड़े-टुकड़े कर डाले,
एक बंटवारा तो कम था, आओ सौ बटवारे कर डाले, 
जन्म-भूमि ईश्वर की है, पर इंसान यहाँ जलते ,
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



जहाँ मुलाजिम घोटालों के, पर्वत पर जा बसते है,
ख़ून गरीबों का वे चूस, अपनी थाली को भरते है |
मंत्री बन बैठे संसद में , आरोपी गद्दार सही,
लड़ना हम सब भूल गए, नहीं बचा खुद्दार कोई |
2G 3G के प्रपंच में, अगर कभी फंस जाते है ,
खातिर खूब होती तिहाड़ में, मुर्ग-मस्सलम खाते है |
अरे ! इस देश में कातिल-हत्यारों के, बुत बना करते ...
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



अगर जीत होती सत्य की, तो जेसिका क्यों मरती ?
बच्चों की नंगी लाशें, गड्ढों में है क्यों सड्ती ?
अफज़ल-कसाब क्यों फाँसी के तख्ते से बचते जाते है ?
और बेगुनाह क्यों लोकल के डब्बों में मरते जाते है ?
कभी ताज तो कभी न्यायलय, संसद तक का मान नहीं,
आज शाम क्या घर लौटूंगा इसका भी कोई  भान नहीं |
यहाँ जीने की सजा नागरिक जीवन भर सहते, 
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



लेकिन भारत वर्ष अभी जिंदा है, उठना और लड़ना होगा, 
देश बदलने भारत की , जनता को ही बढना होगा |
 इतिहास गवाह है , जब जब संकट के बादल अंधेर छाए है,
कभी राम , कभी गांधी, कभी अन्ना परिवर्तन लाए है |  
विश्वास हमें करना होगा, निश्चय मन में करना होगा, 
परिवर्तन की आंधी को संग लेकर चलना होगा |       
अरे ! खंडहर से महल बनाने वाले, वीर यहाँ बसते ...
इसीलिए कहते हम .... सत्य मेव जयते, सत्य मेव जयते ||  


 


1 comment:

  1. simply fabulous Rishabh , words cannot convey my feelings ....all I can say that I wish... we had more young men like you...

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...